Monday, 31 December 2012

तुम्हारी यादों में

देखो ना नया साल गया है
और तुम कहां हां ?
लोगों के मन पर मस्ती का समां छा गया है
और तुम कहां हो।

तुम्हें दिल ढूंढता है निगाहों के आस-पास,
और तुम खुद में मग्न हो
मुझे छोड़ के यूं उदास

यकीं नहीं करता मन कि तुम मुझसे दूर हो,
पर समझ सकती हूं कि
तुम भी तो मजबूर हो।

देखो ना चारों तरफ शोर है
और मैं
मैं इस भीड़ में भी अकेली,
ऐसे जैसे कोई अनाथ
बिना साथी या सहेली।

बहुत हैं दुनिया में कहने को अपने भी
पर रह गए वो मेरे लिए
बन के मात्र सपने ही,

अब तो जाओ इन्तजार नहीं होता है,
तेरे दीदार बिन श्रृंगार नहीं होता है,
यहां बहार में भी पतझड़ का समां छा गया है
और तुम कहां हो ?
देखो ना साल नया गया है
और तुम कहां हो ?