Friday, 4 January 2013

मेरे हमसफर


कितना अन्तर है तब के सफर में
और अब के सफर में !
तब मैं तुम्हारे कन्धे के सहारे थी,
और अब मै बिना किसी सहारे थी,
तब मैं तुम्हारी बाहें थामें चल रही थी, 
और अब मैं खुद ही गिर और सम्भल रही थी, 
तब वक्त अपनी आदत से मजबूर था,
और अब मैं उसे गुजारने को मजबूर थी।

कितना अन्तर है तब के काशी में
और अब के काशी में !
तब वो मेरे मन की ही तरह कितना पुलकित था,
और अब वो मुझे देखकर शायद खुद ही लज्जित था,
तब मैं तुम्हारे उंगलियों के सहारे सीढि़़यां चढ़ी उतरी थी,
और अब मैं उसी शहर में कितनी बिखरी-बिखरी थी,
निगाहों को किसी के सहारे की तलाश तो थी,
पर अब उसे पाने की कोई आस ना थी।

कितना अन्तर है तब के जीवन में
और अब के जीवन में !
तब मुझमें किसी की चाहत थी,
तब मुझमें किसी का प्यार था,
तब मुझे किसी से शिकायत थी,
तब मुझे किसी का इंतजार था,

 पर अब ना ही चाहत है, ना ही प्यार,
ना ही शिकायत है, ना ही इंतजार,
अब तो, बस मैं दुनिया के नजर में तो हूं,
पर खुद की नजर में नहीं,
अब मुझे मौत भी क्यूं आए ?
क्या अब भी मरने की जरुरत है कहीं ?

Thursday, 3 January 2013

हम पंछी उन्मुक्त गगन के


हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे ।
हम बहता जल पीनेवाले
मर जाऍंगे भूखे-प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।
स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले ।
ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने ।
होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती सॉंसों की डोरी ।
नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।

क्योंकि सपना है अभी भी


...क्योंकि सपना है अभी भी
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
...क्योंकि सपना है अभी भी!
तोड़ कर अपने चतुर्दिक का छलावा
जब कि घर छोड़ा, गली छोड़ी, नगर छोड़ा
कुछ नहीं था पास बस इसके अलावा
विदा बेला, यही सपना भाल पर तुमने तिलक की तरह आँका था
(एक युग के बाद अब तुमको कहां याद होगा?)
किन्तु मुझको तो इसी के लिए जीना और लड़ना
है धधकती आग में तपना अभी भी
....क्योंकि सपना है अभी भी!
तुम नहीं हो, मैं अकेला हूँ मगर
वह तुम्ही हो जो
टूटती तलवार की झंकार में
या भीड़ की जयकार में
या मौत के सुनसान हाहाकार में
फिर गूंज जाती हो
और मुझको
ढाल छूटे, कवच टूटे हुए मुझको
फिर तड़प कर याद आता है कि
सब कुछ खो गया है - दिशाएं, पहचान, कुंडल,कवच
लेकिन शेष हूँ मैं, युद्धरत् मैं, तुम्हारा मैं
तुम्हारा अपना अभी भी
इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धूंध धुमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
... क्योंकि सपना है अभी भी!

जब उदासी चारों ओर छाई हो और धैर्य जवाब दे जाए तो ये सोचना चाहिए -


नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।
संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को ।