Friday, 4 January 2013

मेरे हमसफर


कितना अन्तर है तब के सफर में
और अब के सफर में !
तब मैं तुम्हारे कन्धे के सहारे थी,
और अब मै बिना किसी सहारे थी,
तब मैं तुम्हारी बाहें थामें चल रही थी, 
और अब मैं खुद ही गिर और सम्भल रही थी, 
तब वक्त अपनी आदत से मजबूर था,
और अब मैं उसे गुजारने को मजबूर थी।

कितना अन्तर है तब के काशी में
और अब के काशी में !
तब वो मेरे मन की ही तरह कितना पुलकित था,
और अब वो मुझे देखकर शायद खुद ही लज्जित था,
तब मैं तुम्हारे उंगलियों के सहारे सीढि़़यां चढ़ी उतरी थी,
और अब मैं उसी शहर में कितनी बिखरी-बिखरी थी,
निगाहों को किसी के सहारे की तलाश तो थी,
पर अब उसे पाने की कोई आस ना थी।

कितना अन्तर है तब के जीवन में
और अब के जीवन में !
तब मुझमें किसी की चाहत थी,
तब मुझमें किसी का प्यार था,
तब मुझे किसी से शिकायत थी,
तब मुझे किसी का इंतजार था,

 पर अब ना ही चाहत है, ना ही प्यार,
ना ही शिकायत है, ना ही इंतजार,
अब तो, बस मैं दुनिया के नजर में तो हूं,
पर खुद की नजर में नहीं,
अब मुझे मौत भी क्यूं आए ?
क्या अब भी मरने की जरुरत है कहीं ?