Saturday, 30 April 2011

तुम क्या जानो साथी



तुम क्या जानो साथी
कि मात्र सपनों और उम्मीदों के मलबों के सहारे
जीवन बिताना कितना कठिन है...
जब उनके पूरे होने में संशय हो 
और इसका कारण भी तुम खुद नहीं हो !

जब हवा, पानी, चाँद... मौसम और जिंदगी...
तुम्हारे सामने अपने 
सुनहले अर्थों को गंवाकर
सिर्फ़ एक उदासी भरे
लंबे अकेलेपन का हिस्सा रह जाय...
कितना कड़वा होता है 
ऐसे दिनों को जीते जाना ! लगातार...

तुम क्या जानो मेरी साथी
मैं क्या चाहता रहा
और क्यों, 
उससे महज़ थोड़े से ही फासले पर रहा ? 


प्रेम एक ऐसी नदी बनकर
हमारे बीच बहता रहा है
जिसकी धारों में हमें
उतर कर 
उसी में घुलमिल जाना था आख़िरकार
लेकिन 
आज यह है कि
इसके एक पाट पर तुम हो,
एक पाट पर मैं...
और नदी वही दरम्यान है !
हमदोनों से निस्संग 
यद्यपि हम दोनों को छूती हुई...

मैं उसे प्यार करता था




मैं उसे प्यार करता था
इतना कि
दूर चला गया उससे
ताकि महसूस कर सकूं
जुंबिश उसकी चाहत की
हर पल

मैं उसे खुश देखना चाहता था
इतना कि
मैंने हटा लीं अपने नजरें
उस पर से
ताकि नजर न आ सके
एक भी आंसू

मैं पाना चाहता था सानिध्य
दूध और पानी जैसा
और मैंने
छुड़ा लिया दामन कि
ये ख्वाब,
बचा ही रहे साबुत

मैं बहुत जोर से हंसना चाहता था
इतनी तेज कि
मेरे भीतर का विषाद
घबराकर दम तोड़ दे
भीतर ही...

मैं बो देना चाहता था खुशियों के बीज
समूची धरती पर
इसलिए उठा लिए हथियार
कि इनसे लडऩे को ही
आतुर हो उठें मुस्कुराहटें


मैं तुम्हें रोकना चाहता था
इसलिए मैंने जाने दिया तुम्हें
ताकि रोकने की उस चाहत को
रोके रह सकूं सीने में
हमेशा...

राधा



वह, जो चला गया था
किसी गुरुतम उद्देश्य के लिए
मुझे छोड़,
उसके रंग-रस से
कितनी भरी-लसरी हूँ अबतक...
या रिक्त प्राण हूँ कितनी-
उसके बिना...
क्या ऐसा कुछ कह पाना संभव होगा
(क्या चुप रहना संभव होगा?)
आज अगर वह मिल जाये
तो क्या कहूँगी उस से...

वह ज्ञाता हैजानता तो होगा
कि वक़्त ने किये होंगे ही
मेरी काया पर भी
दस्तखत अपने
फिर भी डरती हूँ अपनी परछाई देख....
अस्थि-मज्जा-रक्त की देह यह
कितनी बड़ी अड़चन है....ओह!
राह में
आज अगर वह मिल जाये
तो क्या पहचान लेगा मुझे...


तुम चले गए कृष्ण !
लो मैं और लसर गयी तुममें...
अब इस यमुना की लहरों के बीच
खड़ी मैं...
भीतर श्याम छबि तुम्हारी
और बाहर श्यामल यमुना यह
(जैसे नदी में घट,
जल से भरा हुआ कोई)
मुझ सी बौरायी को
दूर कैसे करोगे खुदसे......
कैसे नकारोगे
मेरी जीवट तुच्छ व्यापकता?

Thursday, 28 April 2011

I'll never find another you




There's a new world somewhere
They call The Promised Land
And I'll be there some day
If you will hold my hand
I still need you there beside me
No matter what I do
For I know I'll never find another you

There is always someone

For each of us they say
And you'll be my someone
For ever and a day
I could search the whole world over
Until my life is through
But I know I'll never find another you

It's a long, long journey

So stay by my side
When I walk through the storm
You'll be my guide, be my guide

If they gave me a fortune

My treasure would be small
I could lose it all tomorrow
And never mind at all
But if I should lose your love, dear
I don't know what I'll do
For I know I'll never find another you

But if I should lose your love, dear

I don't know what I'll do
For I know I'll never find another you

Another you, another you

 

Monday, 25 April 2011

तुमसे चाहता है मन

जो तुमसे चाहता है मन
तुम्हारे साथ हसना
तुम्हारे साथ रोना
तुम्हारे साथ रहना
तुम्हारे साथ सोना....
न जाने कितनी बातें हैं
जो तुमसे चाहता है मन
तुम्हीं से बात करना
तुम्ही से रूठ जाना
तुम्हारे साथ जग से जूझना भी
तुम्हे दुनिया से लेकर भाग jaana
सजल मासूम आँखे चूम लेना
तुम्हारी रात के सपने सजआना
तुम्ही हर बात में आदेश देना
तुम्हारी चाह को माथे लगना
न जाने कितनी बातें है
जो तुमसे चाहता है मन
विकत अनजान राहों में
तुम्हारा हाथ पाना
तुम्हारे मान का सम्मान करना
अडिग विश्वास से नाता निभाना
तुम्हारे रूप गुन की दाद देना
तुम्हारे शील को साथी बनाना
न जाने कितनी बातें हैं
जो तुमसे चाहता है मन
तुम्ही से ओज पाना
तुम्हारी धार को भी शान देना
तुम्हारे आसुओं के मोल बिकना
की अपनी आन पर भी जान देना
कभी चुपके, कभी खुल के
तुम्ही को चाह लेना
तुम्ही में डूब जाना
अटल गहराइयों की थाह लेना
न जाने कितनी बातें हैं
जो तुमसे चाहता है मन।

उन आँखों के नाम ....




कौन कहता है ..... यादों के सहारे ज़िन्दगी बसर नहीं होती ?

होती है .... यक़ीनन होती है .....और इस तेवर से होती है !!

वो ख़ूबसूरत-सा एहसास, ज़िन्दगी करने को काफ़ी नहीं होता क्या ?




एक मुद्दत हुई डूबा था इन्हीं आँखों में 'मीत'
डूब कर फिर न वो उबरा, न उबरना चाहा


तेरी आँखों की कशिश, एक इशारा उन का
ज़िन्दगी भर के लिए अब है सहारा जिन का
तेरी आँखों में मुहब्बत का वो दरिया देखा
तेरी आँखों से सदाक़त का जो पैग़ाम मिला
थम गई उम्र-ए-रवां आ गया दिल को वो सुकूँ
गोया इस दिल को यही चाह थी हमेशा से
और मैं अपने ही तक़ाज़ों से बेगाना था

इस ज़माने से, ज़माने के तक़ाज़ों से जुदा
ज़िन्दगी चल रही थी, मुझ को ये गुमाँ भी न था
होगा ये हादिसा, इस का कोई इम्काँ भी न था
एक ख़ामोश चाँद-रात दबे पाँव कहीं
बेसदा और बेआवाज़ यूँ तेरा आना
और ख़ामोश मेरी ज़िन्दगी पे छा जाना

सानिहा ऐसा एक बार ही गुज़रता है दोस्त
एक ही बार कोई इस तरह किसी के लिए
हर नफ़स जीता है और हर नफ़स यूँ मरता है दोस्त
इक ज़रुरत, कि उसे जिस की ख़बर तक भी न हो
पूरी हो गर, तो बशर कुछ भी कर गुज़रता है दोस्त !






सदाक़त = सच्चाई
उम्र-ए-रवां = चलती हुई उम्र / ज़िन्दगी
तक़ाज़ा = ज़रूरत
इम्काँ = संभावना
सानिहा = हादिसा
नफ़स = साँस
बशर = इंसान


मन बहुत सोचता है


मन बहुत सोचता है कि उदास न हो
 पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय?

 शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले,
 पर यह अपने ही रचे एकान्त का दबाव सहा कैसे जाय!

 नील आकाश, तैरते-से-मेघ के टुकड़े,
 खुली घासों में दौड़ती मेघ-छायाएँ,
 पहाड़ी नदी : पारदर्शी पानी,
 धूप-धुले तल के रंगारंग पत्थर,
 सब देख बहुत गहरे कहीं जो उठे,
 वह कहूँ भी तो सुनने को कोई पास न हो—
 इसी पर जो जी में उठे वह कहा कैसे जाय!

 मन बहुत सोचता है कि उदास न हो, न हो,
 पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय!

तुम मेरी ही दीवानी हो


 संकोच-भार को सह न सका
 पुलकित प्राणों का कोमल स्वर
 कह गये मौन असफलताओं को
 प्रिय आज काँपते हुए अधर ।

 छिप सकी हृदय की आग कहीं ?
 छिप सका प्यार का पागलपन ?
 तुम व्यर्थ लाज की सीमा में
 हो बाँध रही प्यासा जीवन ।

 तुम करूणा की जयमाल बनो,
 मैं बनूँ विजय का आलिंगन
 हम मदमातों की दुनिया में,
 बस एक प्रेम का हो बन्धन ।

 आकुल नयनों में छलक पड़ा
 जिस उत्सुकता का चंचल जल
 कम्पन बन कर कह गई वही
 तन्मयता की बेसुध हलचल ।

 तुम नव-कलिका-सी-सिहर उठीं
 मधु की मादकता को छूकर
 वह देखो अरुण कपोलों पर
 अनुराग सिहरकर पड़ा बिखर ।

 तुम सुषमा की मुस्कान बनो
 अनुभूति बनूँ मैं अति उज्जवल
 तुम मुझ में अपनी छवि देखो,
 मैं तुममें निज साधना अचल ।

 पल-भर की इस मधु-बेला को
 युग में परिवर्तित तुम कर दो
 अपना अक्षय अनुराग सुमुखि,
 मेरे प्राणों में तुम भर दो ।

 तुम एक अमर सन्देश बनो,
 मैं मन्त्र-मुग्ध-सा मौन रहूँ
 तुम कौतूहल-सी मुसका दो,
 जब मैं सुख-दुख की बात कहूँ ।

 तुम कल्याणी हो, शक्ति बनो
 तोड़ो भव का भ्रम-जाल यहाँ
 बहना है, बस बह चलो, अरे
 है व्यर्थ पूछना किधर-कहाँ?

 थोड़ा साहस, इतना कह दो
 तुम प्रेम-लोक की रानी हो
 जीवन के मौन रहस्यों की
 तुम सुलझी हुई कहानी हो ।

 तुममें लय होने को उत्सुक
 अभिलाषा उर में ठहरी है
 बोलो ना, मेरे गायन की
 तुममें ही तो स्वर-लहरी है ।

 होंठों पर हो मुस्कान तनिक
 नयनों में कुछ-कुछ पानी हो
 फिर धीरे से इतना कह दो
 तुम मेरी ही दीवानी हो ।

Friday, 22 April 2011

बस इतना अब चलना होगा

बस इतना अब चलना होगा
फिर अपनी-अपनी राह हमें ।

कल ले आई थी खींच, आज
ले चली खींचकर चाह हमें
तुम जान न पाईं मुझे, और
तुम मेरे लिए पहेली थीं;
पर इसका दुख क्या? मिल न सकी
प्रिय जब अपनी ही थाह हमें ।

तुम मुझे भिखारी समझें थीं,
मैंने समझा अधिकार मुझे
तुम आत्म-समर्पण से सिहरीं,
था बना वही तो प्यार मुझे ।
तुम लोक-लाज की चेरी थीं,
मैं अपना ही दीवाना था
ले चलीं पराजय तुम हँसकर,
दे चलीं विजय का भार मुझे ।

सुख से वंचित कर गया सुमुखि,
वह अपना ही अभिमान तुम्हें
अभिशाप बन गया अपना ही
अपनी ममता का ज्ञान तुम्हें
तुम बुरा न मानो, सच कह दूँ,
तुम समझ न पाईं जीवन को
जन-रव के स्वर में भूल गया
अपने प्राणों का गान तुम्हें ।

था प्रेम किया हमने-तुमने
इतना कर लेना याद प्रिये,
बस फिर कर देना वहीं क्षमा
यह पल-भर का उन्माद प्रिये।
फिर मिलना होगा या कि नहीं
हँसकर तो दे लो आज विदा
तुम जहाँ रहो, आबाद रहो,
यह मेरा आशीर्वाद प्रिये ।

तुम अपनी हो, जग अपना है

तुम अपनी हो, जग अपना है
किसका किस पर अधिकार प्रिये
फिर दुविधा का क्या काम यहाँ
इस पार या कि उस पार प्रिये ।

देखो वियोग की शिशिर रात
आँसू का हिमजल छोड़ चली
ज्योत्स्ना की वह ठण्डी उसाँस
दिन का रक्तांचल छोड़ चली ।

चलना है सबको छोड़ यहाँ
अपने सुख-दुख का भार प्रिये,
करना है कर लो आज उसे
कल पर किसका अधिकार प्रिये ।

है आज शीत से झुलस रहे
ये कोमल अरुण कपोल प्रिये
अभिलाषा की मादकता से
कर लो निज छवि का मोल प्रिये ।

इस लेन-देन की दुनिया में
निज को देकर सुख को ले लो,
तुम एक खिलौना बनो स्वयं
फिर जी भर कर सुख से खेलो ।

पल-भर जीवन, फिर सूनापन
पल-भर तो लो हँस-बोल प्रिये
कर लो निज प्यासे अधरों से
प्यासे अधरों का मोल प्रिये ।

सिहरा तन, सिहरा व्याकुल मन,
सिहरा मानस का गान प्रिये
मेरे अस्थिर जग को दे दो
तुम प्राणों का वरदान प्रिये ।

भर-भरकर सूनी निःश्वासें
देखो, सिहरा-सा आज पवन
है ढूँढ़ रहा अविकल गति से
मधु से पूरित मधुमय मधुवन ।

यौवन की इस मधुशाला में
है प्यासों का ही स्थान प्रिये
फिर किसका भय? उन्मत्त बनो
है प्यास यहाँ वरदान प्रिये ।

देखो प्रकाश की रेखा ने
वह तम में किया प्रवेश प्रिये
तुम एक किरण बन, दे जाओ
नव-आशा का सन्देश प्रिये ।

अनिमेष दृगों से देख रहा
हूँ आज तुम्हारी राह प्रिये
है विकल साधना उमड़ पड़ी
होंठों पर बन कर चाह प्रिये ।

मिटनेवाला है सिसक रहा
उसकी ममता है शेष प्रिये
निज में लय कर उसको दे दो
तुम जीवन का सन्देश प्रिये ।

तुम मृगनयनी

तुम मृगनयनी, तुम पिकबयनी
तुम छवि की परिणीता-सी,
अपनी बेसुध मादकता में
भूली-सी, भयभीता सी ।

तुम उल्लास भरी आई हो
तुम आई उच्छ्‌वास भरी,
तुम क्या जानो मेरे उर में
कितने युग की प्यास भरी ।

शत-शत मधु के शत-शत सपनों
की पुलकित परछाईं-सी,
मलय-विचुम्बित तुम ऊषा की
अनुरंजित अरुणाई-सी ;

तुम अभिमान-भरी आई हो
अपना नव-अनुराग लिए,
तुम क्या जानो कि मैं तप रहा
किस आशा की आग लिए ।

भरे हुए सूनेपन के तम
में विद्युत की रेखा-सी;
असफलता के पट पर अंकित
तुम आशा की लेखा-सी ;

आज हृदय में खिंच आई हो
तुम असीम उन्माद लिए,
जब कि मिट रहा था मैं तिल-तिल
सीमा का अपवाद लिए ।

चकित और अलसित आँखों में
तुम सुख का संसार लिए,
मंथर गति में तुम जीवन का
गर्व भरा अधिकार लिए ।

डोल रही हो आज हाट में
बोल प्यार के बोल यहाँ,
मैं दीवाना निज प्राणों से
करने आया मोल यहाँ ।

अरुण कपोलों पर लज्जा की
भीनी-सी मुस्कान लिए,
सुरभित श्वासों में यौवन के
अलसाए-से गान लिए ,

बरस पड़ी हो मेरे मरू में
तुम सहसा रसधार बनी,
तुममें लय होकर अभिलाषा
एक बार साकार बनी ।

तुम हँसती-हँसती आई हो
हँसने और हँसाने को,
मैं बैठा हूँ पाने को फिर
पा करके लुट जाने को ।

तुम क्रीड़ा की उत्सुकता-सी,
तुम रति की तन्मयता-सी;
मेरे जीवन में तुम आओ,
तुम जीवन की ममता-सी।

साजन आए, सावन आया

अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
साजन आए, सावन आया ।

धरती की जलती साँसों ने
मेरी साँसों में ताप भरा,
सरसी की छाती दरकी तो
कर घाव गई मुझपर गहरा,

है नियति-प्रकृति की ऋतुओं में
संबंध कहीं कुछ अनजाना,
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
साजन आए, सावन आया ।

तुफान उठा जब अंबर में
अंतर किसने झकझोर दिया,
मन के सौ बंद कपाटों को
क्षण भर के अंदर खोल दिया,

झोंका जब आया मधुवन में
प्रिय का संदेश लिए आया-
ऐसी निकली ही धूप नहीं
जो साथ नहीं लाई छाया ।
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
साजन आए, सावन आया ।

घन के आँगन से बिजली ने
जब नयनों से संकेत किया,
मेरी बे-होश-हवास पड़ी
आशा ने फिर से चेत किया,

मुरझाती लतिका पर कोई
जैसे पानी के छींटे दे,
ओ' फिर जीवन की साँसे ले
उसकी म्रियमाण-जली काया ।
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
साजन आए, सावन आया ।

रोमांच हुआ जब अवनी का
रोमांचित मेरे अंग हुए,
जैसे जादू की लकड़ी से
कोई दोनों को संग छुए,

सिंचित-सा कंठ पपीहे का
कोयल की बोली भीगी-सी,
रस-डूबा, स्वर में उतराया
यह गीत नया मैंने गाया ।
अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं,
साजन आए, सावन आया ।

आज तुम मेरे लिए हो

प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।

मैं जगत के ताप से डरता नहीं अब,
मैं समय के शाप से डरता नहीं अब,
आज कुंतल छाँह मुझपर तुम किए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।

रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,
आज आधे विश्व से अभिसार मेरा,
तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

वह सुरा के रूप से मोहे भला क्या,
वह सुधा के स्वाद से जाए छला क्या,
जो तुम्हारे होंठ का मधु-विष पिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

मृत-सजीवन था तुम्हारा तो परस ही,
पा गया मैं बाहु का बंधन सरस भी,
मैं अमर अब, मत कहो केवल जिए हो
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

प्रिय गाँव मेरे तू चल

प्रिय गाँव मेरे तू चल , तेरे शहर में क्या रखा है
यहाँ बोतलों में शहद , वहां बोलियों में भरा है

उस दिन जब आई थी बरसात तेज हवाओ वाली
आँगन में ही छूट गए थे लोटा ,चिमटा, थाली !
दौड़ के तूने बड़े चाव से रखा था जो छत पर
सारी रात घुमड़ कर बरसा फिर भी तेरा बर्तन खाली
मेरे गाँव का सीडी दार कुआ ,देख मुहँ तक भरा है !!!
प्रिय गाँव मेरे तू चल , तेरे शहर में क्या रखा है
यहाँ बोतलों में शहद , वहां बोलियों में भरा है

ना भंवरे , न पवन झकोरे , ना तितली ही आती ,
गमलों में तू फूल खिला, ये कैसा सावन लाती !
तेरे नरम मुलायम मिटटी हो ना सकी उपजाऊ
गाँव के मंदिर पीपल फुट भेद दिवार की छाती
जहाँ बंधती है मेरी गाय , वो ठूठ तक भी हरा है !!!!
प्रिय गाँव मेरे तू चल , तेरे शहर में क्या रखा है
यहाँ बोतलों में शहद , वहां बोलियों में भरा है

पीपल पत्थर पूजे ,मांगे अच्छे वर की मनोती ,
भोली लड़किया , देवलोक को दे देती है चुनोती ,
तू है मानती प्रेम वेदना Velentine day में ,
वो है मानती फाग रंग को अपनी प्रेम बपोती
उसके विश्वास का सोना , देख कितना खरा है !!!
प्रिय गाँव मेरे तू चल , तेरे शहर में क्या रखा है
यहाँ बोतलों में शहद , वहां बोलियों में भरा है

जाने के ये खबर उसे कोई….

चुभे है तीर सा,जब न मिले है जवाब उनसे
वो असल मैं है मशरूफ, या दर्द बेखबर उसे कोई?

मेरी बातो की तड़प का अंदाजा उसे नहीं शायद
मेरे लफ्जो को समझे भी, या इनकार उसे कोई ?

वो सोचे है के जिंदगी मैं गहरायी है बड़ी
मुझे न कल की खबर,जाने के ये खबर उसे कोई ?

बहुत हुई कोशिश उसके दो लफ्ज़ पाने की
अब तो शक !! के वो दिल है,या दिया पत्थर उसे कोई ?

प्रतीक्षा

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?
मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
साँसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?

उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले,
तारों की महफिल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता?

बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती,
रगरग में चेतनता घुलकर, आँसू के कणसी झर जाती,
नमक डलीसा गल अपनापन, सागर में घुलमिलसा जाता,
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता?

इस पार, उस पार

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में
कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरालहरा यह शाखाएँ
कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ
हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से
संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले
मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का
उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



जग में रस की नदियाँ बहती,
रसना दो बूंदें पाती है,
जीवन की झिलमिलसी झाँकी
नयनों के आगे आती है,
स्वरतालमयी वीणा बजती,
मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं
यह वायु उड़ा ले जाती है;
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये,
ये साधन भी छिन जाएँगे;
तब मानव की चेतनता का
आधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



प्याला है पर पी पाएँगे,
है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है,
असमर्थबना कितना हमको,
कहने वाले, पर कहते है,
हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता
है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं, कहकर ही
कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का
अधिकार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



कुछ भी न किया था जब उसका,
उसने पथ में काँटे बोये,
वे भार दिए धर कंधों पर,
जो रो-रोकर हमने ढोए;
महलों के सपनों के भीतर
जर्जर खँडहर का सत्य भरा,
उर में ऐसी हलचल भर दी,
दो रात न हम सुख से सोए;
अब तो हम अपने जीवन भर
उस क्रूर कठिन को कोस चुके;
उस पार नियति का मानव से
व्यवहार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



संसृति के जीवन में, सुभगे
ऐसी भी घड़ियाँ आएँगी,
जब दिनकर की तमहर किरणे
तम के अन्दर छिप जाएँगी,
जब निज प्रियतम का शव, रजनी
तम की चादर से ढक देगी,
तब रवि-शशि-पोषित यह पृथ्वी
कितने दिन खैर मनाएगी!
जब इस लंबे-चौड़े जग का
अस्तित्व न रहने पाएगा,
तब हम दोनो का नन्हा-सा
संसार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



ऐसा चिर पतझड़ आएगा
कोयल न कुहुक फिर पाएगी,
बुलबुल न अंधेरे में गागा
जीवन की ज्योति जगाएगी,
अगणित मृदु-नव पल्लव के स्वर
‘मरमर’ न सुने फिर जाएँगे,
अलि-अवली कलि-दल पर गुंजन
करने के हेतु न आएगी,
जब इतनी रसमय ध्वनियों का
अवसान, प्रिये, हो जाएगा,
तब शुष्क हमारे कंठों का
उद्गार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जन
निर्झरिणी भूलेगी नर्तन,
निर्झर भूलेगा निज ‘टलमल’,
सरिता अपना ‘कलकल’ गायन,
वह गायक-नायक सिन्धु कहीं,
चुप हो छिप जाना चाहेगा,
मुँह खोल खड़े रह जाएँगे
गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण;
संगीत सजीव हुआ जिनमें,
जब मौन वही हो जाएँगे,
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का
जड़ तार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!




उतरे इन आखों के आगे
जो हार चमेली ने पहने,
वह छीन रहा, देखो, माली,
सुकुमार लताओं के गहने,
दो दिन में खींची जाएगी
ऊषा की साड़ी सिन्दूरी,
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा
पाएगा कितने दिन रहने;
जब मूर्तिमती सत्ताओं की
शोभा-सुषमा लुट जाएगी,
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का
श्रृंगार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!




दृग देख जहाँ तक पाते हैं,
तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा कोई
हम सब को खींच बुलाता है;
मैं आज चला तुम आओगी
कल, परसों सब संगीसाथी,
दुनिया रोती-धोती रहती,
जिसको जाना है, जाता है;
मेरा तो होता मन डगडग,
तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा
मँझधार, न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!



Harivansh Rai Bachchan.

प्रेम-वीणा

 तुम्हारी प्रेम-वीणा का अछूता तार मैं भी हूँ
 मुझे क्यों भूलते वादक विकल झंकार मैं भी हूँ

 मुझे क्या स्थान-जीवन देवता होगा न चरणों में
 तुम्हारे द्वार पर विस्मृत पड़ा उपहार मैं भी हूँ

 बनाया हाथ से जिसको किया बर्बाद पैरों से
 विफल जग में घरौंदों का क्षणिक संसार मैं भी हूँ

 खिला देता मुझे मारूत मिटा देतीं मुझे लहरें
 जगत में खोजता व्याकूल किसी का प्यार मैं भी हूँ

 कभी मधुमास बन जाओ हृदय के इन निकुंजों में
 प्रतीक्षा में युगों से जल रही पतझाड़ मैं भी हूँ

 सरस भुज बंध तरूवर का जिसे दुर्भाग्य से दुस्तर
 विजन वन वल्लरी भूतल-पतित सुकुमार मैं भी हूँ

प्रतिध्वनि

देखना
एक दिन
इस तरह चला जाऊंगा
ढूंढोगी तो दिखूंगा नहीं

लौटता रहा हूँ बार-बार
प्रतिध्वनि बनकर
तुम्हारे जीवन में

देखना
एक दिन
इस तरह चला जाऊंगा

लौट नहीं पाऊंगा
प्रतिध्वनि बनकर
तुम्हारे जीवन में।

गुज़रे वक़्त के आँसू

तुम्हें आख़िरकार
देख रहा हूँ

तुम्हारी आँखों में
गुज़रे वक़्त के आँसू हैं

मैं तुम्हें हमेशा के लिए
छोड़कर जाने वाला हूँ

यकायक देखता हूँ
तुम्हारे पीछे खड़ी
एक दूसरी स्त्री को
जो लगभग तुम्हारी जैसी है

मुझ से कह रही है
किसी को छोड़कर तुम
कैसे पा सकोगे मुझे?

दिल से उतर भी नहीं जाता

कुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता
 वो शख़्स कोई फ़ैसला कर भी नहीं जाता

 आँखें हैं के खाली नहीं रहती हैं लहू से
 और ज़ख्म-ए-जुदाई है के भर भी नहीं जाता

 वो राहत-ए-जान है इस दरबदरी में
 ऐसा है के अब ध्यान उधर भी नहीं जाता

 हम दोहरी अज़ीयत के गिरफ़्तार मुसाफ़िर
 पाऔं भी हैं शील शौक़-ए-सफ़र भी नहीं जाता

 दिल को तेरी चाहत पर भरोसा भी बहुत है
 और तुझसे बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता

 पागल होते हो 'फ़राज़' उससे मिले क्या
 इतनी सी ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता

बिखर के न सिमट सका

कभी मोम बन के पिघल गया कभी गिरते गिरते सँभल गया
वो बन के लम्हा गुरेज़ का मेरे पास से निकल गया

उसे रोकता भी तो किस तरह के वो शख़्स इतना अजीब था
कभी तड़प उठा मेरी आह से कभी अश्क़ से न पिघल सका

सरे-राह मिला वो अगर कभी तो नज़र चुरा के गुज़र गया
वो उतर गया मेरी आँख से मेरे दिल से क्यूँ न उतर सका

वो चला गया जहाँ छोड़ के मैं वहाँ से फिर न पलट सका
वो सँभल गया था 'फ़राज़' मगर मैं बिखर के न सिमट सका

थोड़ी दूर साथ चालो

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो
 बहुत बड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चालो

 तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
 मैं जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो

 नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
 बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो

 ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़नीमत है
 किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो

 अभी तो जाग रहे हैं चिराग़ राहों के
 अभी है दूर सहर थोड़ी दूर साथ चलो

 तवाफ़-ए-मन्ज़िल-ए-जानाँ हमें भी करना है
 "फ़राज़" तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो

ज़माना बहुत हुआ

उसको जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ

ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़
ऐ मर्ग-ए-नागहाँ तेरा आना बहुत हुआ

हम ख़ुल्द से निकल तो गये हैं पर ऐ ख़ुदा
इतने से वाक़ये का फ़साना बहुत हुआ

अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी
उससे ज़रा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ

अब क्यों न ज़िन्दगी पे मुहब्बत को वार दें
इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ

अब तक तो दिल का दिल से तार्रुफ़ न हो सका
माना कि उससे मिलना मिलाना बहुत हुआ

क्या-क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल
ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ

कहता था नासेहों से मेरे मुँह न आईओ
फिर क्या था एक हू का बहाना बहुत हुआ

लो फिर तेरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र
अहद "फ़राज़" तुझसे कहा ना बहुत हुआ

जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते ?

एक बार ही जी भर के सज़ा क्यूँ नहीं देते ?
 मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते ?

 मोती हूँ तो दामन में पिरो लो मुझे अपने,
 आँसू हूँ तो पलकों से गिरा क्यूँ नहीं देते ?

 साया हूँ तो साथ ना रखने कि वज़ह क्या 'फ़राज़',
 पत्थर हूँ तो रास्ते से हटा क्यूँ नहीं देते ?

प्यार लिखा है

नए साल में
प्यार लिखा है
तुम भी लिखना

प्यार प्रकृति का शिल्प
काव्यमय ढाई आखर
प्यार सृष्टि पयार्य
सभी हम उसके चाकर

प्यार शब्द की
मयार्दा हित
बिना मोल, मीरा-सी-बिकना

प्यार समय का कल्प
मदिर-सा लोक व्याकरण
प्यार सहज संभाव्य
दृष्टि का मौन आचरण

प्यार अमल है ताल
कमल-सी,
उसमें दिखना।

तुम चले जाओगे

तुम चले जाओगे
 पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे
 जैसे रह जाती है
 पहली बारिश के बाद
 हवा में धरती की सोंधी-सी गंध
 भोर के उजास में
 थोड़ा-सा चंद्रमा
 खंडहर हो रहे मंदिर में
 अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार|

 तुम चले जाओगे
 पर थोड़ी-सी हँसी
 आँखों की थोड़ी-सी चमक
 हाथ की बनी थोड़ी-सी कॉफी
 यहीं रह जाएँगे
 प्रेम के इस सुनसान में|

 तुम चले जाओगे
 पर मेरे पास
 रह जाएगी
 प्रार्थना की तरह पवित्र
 और अदम्य
 तुम्हारी उपस्थिति,
 छंद की तरह गूँजता
 तुम्हारे पास होने का अहसास|

 तुम चले जाओगे
 और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे|

Wednesday, 20 April 2011

तुम जानों या मैं जानूं



तुम्हारा सच, मेरा सच
बस तुम जानो या मैं जानूं.
तो फिर क्यों है इतनी उम्मीदें, बंधन और कड़वाहट?

तुम्हारा अकेलापन या मेरा अकेलापन
बस तुम जानो या मैं जानूं.
तो फिर क्यों है इतना इंतज़ार और बेकरारी
एक आकांक्षित मिलन की?

तुम्हारे सपनों की हंसीं या उनका रुदन
मेरे सपनों की हंसी या उनका रुदन
बस तुम जानो या मैं जानूं.
तो फिर क्यों है नींदों में मचलती मुस्कुराहटों की झंकार?

जन्म और मृत्यु के बीच का अंतराल
मृत्यु और जन्म के बीच का अंतराल
ये बस तुम जानों या मैं जानूं कि क्यों है इतना इंतज़ार.

अपनी मुहब्बत की दुनिया के राजा रानी, उसी मुहब्बत की दुनिया के भिखारी क्यूं होते है?

Tuesday, 19 April 2011

आखिर क्यों है यह प्यार



कितना भयानक है प्यार
हमें असहाय और अकेला बनाता
हमारे हृदय पटों को खोलता
बेशुमार दुनियावी हमलों के मुकाबिल
खड़ा कर देता हुआ निहत्था
कि आपके अंतर में प्रवेश कर
उथल पुथल मचा दे कोई भी अनजाना
और एक निकम्मे प्रतिरोध के बाद
चूक जाएं आप
कि आप ही की तरह का एक मानुष
महामानव बनने को हो आता
आपको विराट बनाता हुआ
वह आपसे कुछ मांगता नहीं
पर आप हो आते तत्पर सबकुछ देने को उसे
दुहराते कुछ आदिम व्यवहार
मसलन ...
आलिंगन
चुंबन
सित्कार

बंधक बनाते एक दूसरे को
डूबते चले जाते
एक धुधलके में

हंसते या रोते हुए
दुहराते
कि नहीं मरता है प्यार
कल्पना से यथार्थ में आता
प्यार
दिलो दिमाग को
त्रस्त करता
अंततः जकड लेता है
आत्मा को
और खुद को मारते हुए
उस अकाट्य से दर्द को
अमर कर जाते हैं हम...

उधार का यह प्रेम


अगर तुम नहीं चाहती हो
मुझसे करना प्रेम
तो मत करो
स्वतन्त्र हो तुम
जिस तरह स्वतन्त्र है यह आसमान
और यह चिड़िया उड़ने के लिए
कोई उसे बाध्य नहीं कर सकता, बिगाड़ नहीं सकता उसका
और मैं तो तुम्हारा शुक्रगुज़ार ही रहा हूँ
ज़िन्दगी भर, शुभचिन्तक भी
पर एक बात चाहूँगा मैं
तुमसे पूछना
क्या तुम दोगी उधार में
अपना प्रेम
मैं लौटा दूँगा उसे एक दिन
पूरे ब्याज सहित
बहुत दरकार है मुझे उसकी
फ़िलहाल
मैं यह भी नहीं चाहता
कि तुम अपनी इच्छाओं के विरुद्ध
करो मुझसे प्रेम
अपने सपनों, उम्मीदों और कामनाओं के विरुद्ध
विरुद्ध अपनी प्रकृति के
नहीं करना प्रेम, स्वयं का संहार करके तो बिलकुल नहीं
ख़ुद का तिरस्कार करके भी नहीं
मैं तो सिर्फ़ कुछ दिन के लिए
माँग रहा हूँ तुमसे
उधार में यह प्रेम
जब तक यहाँ अन्धकार है
तब तक के लिए
जब तक यह शोर है
तब तक के लिए
जब तक यह उथल-पुथल सिन्धु में तब तक के लिए
वह रहेगा मेरे पास
बहुत सुरक्षित, सौ प्रतिशत
चिन्ता न करो, हरगिज़
बहुत सहेज कर रखूँगा उसे मैं
किसी के आभूषणों
तथा अमानत से भी ज़्यादा सुरक्षित
मैं लौटा दूँगा उसी ही हालत में
अपनी मृत्यु से ठीक पहले
चिता पर जाने से पहले तो ज़रूर ही
बहुत लोगों की बहुत सारी चीज़ें लौटानी हैं मुझे
मेरा रोम-रोम ऋणी है
मैं कर्ज़दार हूँ
कि जब तुम मुझसे प्रेम नहीं करती थी
तब भी तुम मुझसे मिलने आई
ट्रैफिक जाम में फँसकर
मैं यह हरगिज़ नहीं कहूँगा
कोई स्वार्थ था छिपा तुम्हारा
और था अगर
तो क्या नहीं था मेरा भी
तसल्ली पाने का ही स्वार्थ !
इसलिए मैं कहता हूँ
तुम थोड़े दिनों के लिए
उधार में दे दो अपना प्रेम
और फिर देखो किस तरह फूल खिलते हैं
किस तरह पत्ते हरे हो जाते हैं, धमनियों में
किस तरह रक्त बहता है, ख़्वाब किस तरह आते हैं
यह पूरी ज़िन्दगी उधार की है दी हुई
मेरी माँ और मेरे बाप ने मुझे
जीवन दिया, वह भी तो उधार ही था मेरे लिए
मैं उनका कर्ज़ उतार नहीं सका
और वे मृत्यु-लोक में चले गए
जिसने मुझे भाषा दी
उसका भी मैं कर्ज़दार हूँ
लेकिन मैं तुम्हारा कर्ज़ चुकता कर जाऊँगा
हर हालत में भले ही भिखारी बन जाऊँ
किसी का उधार मैं रखता नहीं
लेकिन उसके बदले में
मैं गिरवी रखता हूँ
अपनी ईमानदारी
अपनी निष्ठा
रखता हूँ अपनी आँखों को
अपने सपनों को
तुम्हारे पास गिरवी
जिसमें से कभी-कभी
दो बूँद आँसू निकल आते हैं
तुम्हें रास्ते में याद करते हुए
पता नहीं, तूफ़ान में तुम कैसे होगी फँसी
कैसे होगी तुम इतनी तेज़, मूसलाधार बारिश में
और इतनी चिलचिलाती गर्मी में...
तुम्हारी नाव कहाँ है ?
कहाँ तुम्हारा टूटा हुआ छाता ?
तुम्हारे जीवन का
एक बार फिर
मैं ख़ुद को
अपनी आत्मा को
अपनी त्वचा को
गिरवी रखता हूँ
तुम्हारे पास
पाने के लिए
थोड़ा-सा
तुमसे
तुम्हारा उधार का यह प्रेम !
जिसे मैं लौटा दूँगा बिना शर्त
अविलम्ब
एक दिन....।

जानेमन


अभी तूने वह कविता कहाँ लिखी है, जानेमन
मैंने कहाँ पढ़ी है वह कविता
अभी तो तूने मेरी आँखें लिखीं हैं, होंठ लिखे हैं
कंधे लिखे हैं उठान लिए
और मेरी सुरीली आवाज लिखी है

पर मेरी रूह फ़ना करते
उस शोर की बाबत कहाँ लिखा कुछ तूने
जो मेरे सरकारी जिरह-बख़्तर के बावजूद
मुझे अंधेरे बंद कमरे में
एक झूठी तस्सलीबख़्श नींद में ग़र्क रखता है

अभी तो बस सुरमई आँखें लिखीं हैं तूने
उनमें थक्कों में जमते दिन-ब-दिन
जिबह किए जाते मेरे ख़ाबों का रक्त
कहाँ लिखा है तूने

अभी तो बस तारीफ़ की है
मेरे तुकों की लय पर प्रकट किया है विस्मय
पर वह क्षय कहाँ लिखा है
जो मेरी निग़ाहों से उठती स्वर-लहरियों को
बारहा जज़्ब किए जा रहा है

अभी तो बस कमनीयता लिखी है तूने मेरी
नाज़ुकी लिखी है लबों की
वह बाँकपन कहाँ लिखा है तूने
जिसने हज़ारों को पीछे छोड़ा है
और फिर भी जिसके नाख़ून और सींग
नहीं उगे हैं

अभी तो बस
रंगीन परदों, तकिए के गिलाफ़ और क्रोशिए की
कढ़ाई का ज़िक्र किया है तूने
मेरे जीवन की लड़ाई और चढ़ाई का ज़िक्र
तो बाक़ी है अभी...

अभी तुझे वह कविता लिखनी है, जानेमन
...

Monday, 18 April 2011

If


If you can keep your head when all about you
Are losing theirs and blaming it on you;
If you can trust yourself when all men doubt you,
But make allowance for their doubting too;
If you can wait and not be tired by waiting,
Or, being lied about, don't deal in lies,
Or, being hated, don't give way to hating,
And yet don't look too good, nor talk too wise;


If you can dream - and not make dreams your master;
If you can think - and not make thoughts your aim;
If you can meet with triumph and disaster
And treat those two imposters just the same;
If you can bear to hear the truth you've spoken
Twisted by knaves to make a trap for fools,
Or watch the things you gave your life to broken,
And stoop and build 'em up with wornout tools;


If you can make one heap of all your winnings
And risk it on one turn of pitch-and-toss,
And lose, and start again at your beginnings
And never breath a word about your loss;
If you can force your heart and nerve and sinew
To serve your turn long after they are gone,
And so hold on when there is nothing in you
Except the Will which says to them: "Hold on";


If you can talk with crowds and keep your virtue,
Or walk with kings - nor lose the common touch;
If neither foes nor loving friends can hurt you;
If all men count with you, but none too much;
If you can fill the unforgiving minute
With sixty seconds' worth of distance run -
Yours is the Earth and everything that's in it,
And - which is more - you'll be a Man my son!

Sunday, 17 April 2011

Soul


 But the soul has no culture
 The soul has no nations
 The soul has no color, no accent or way of love
 The soul is forever
 The soul is one
 And when the heart has its moment of truth and sorrow, the soul can't be stilled.

 One of the reasons why we crave love, and seek it so desperately, is that love is the only cure for loneliness, and shame, and sorrow.
 
But some feelings sink so deep into the heart that only loneliness can help you find them again.
 
Some truths about yourself are so painful that only shame can help you live with them.
 
And some things are just so sad that only your soul can do the crying for you.

Friday, 15 April 2011

Meri MAA


Happiness was,
Like a rainfall that decides to end after twenty drops.

Your presence was,
Like sun's rays shining for fifteen minutes and vanishing away.

Your smiles given were,
Like a beautiful dream that starts and then refuses to continue.

Your love was,
Like a song ending after the first verse.

You were,
Like an Angel given to me and then called back to heaven.

Now, I am like a butterfly who has lost its wings in a storm barely minutes after starting to fly.


U R FOR ME MAA

Main , meri tanhai aur teri yad kabhi juda nahi hoti,
juda hoti hain to bas_
Teri mamta bhari bahen, wo galiyan wo rahen ,
Tera nind bhara aanchal, teri pyar bhari lori
Aur wo mera bachpan

Jag men ek tun hi hai jo mujhse kabhi khafa nahi hoti
Khafa hotin hain to bas_
Wo pariyon ki nagri , wo pathrili si dagari
Wo meri dudhiya hansi , ye jeewan ye dhadakan,
Aur wahi mera bachpan

Main hun, jag hai aur hai tumahara dekha hua sapna
Par jahan tum nahi hoti
Hoti hain to bas wahan_
Teri rahmat bhari jholi, teri nasihat bhari boli
Tere tamnnaon ki doli, tere mujhse liye wachan
Aur mera khoya hua bachpan

I must go now



I must go now...
Don't hold me with your eyes and reach my heart accross the room like that or my ownself will break...
Love you? Ofcourse I love you,
That is why I have to go,
Before you know...

GoodBye


Both of us are crying,
May be I am lying,
But still my heart is sighing.

Why did you and I meet?
We both should have stopped this plan of deceit.
What phase was I going through,
To play a game that wasn't true.
I was a loser, I had to lose,
Unlike before, I had to choose.
Your happiness today or your happiness tomorrow.
For both, I got a tinge of sorrow.
Your tomorrow would be better than now,
Don't make me cry, don't ask me how.

This was my chosen fate,
This is where i cannot be late.
I know I have been mean,
But with me, you'll only see a gloomy scene.

Our journey is ending,
No, I am not pretending.
Don't ask me why,
But now is the time I have got to say goodbye.

May be



May be tomorrow the sun will shine,
May be tomorrow the birds will sing.
But it does nothing to me,
If I can't have you,
It will be walking in shadows with tears in my eyes,
Walking in shadows bcoz you are walking on by.
How long long can this night go on,
Without you my life is so wrong...

Thursday, 14 April 2011

A Far Away Dream




The destiny is far away
Where dreams cannot sway,
Desires wait long under the shades of tree
Spell comes and goes
Taking away the sun which had once shone,
Compassion is all I get,
Engulfed in pain,
I pass through a gloomy lane,
No one can see the storm in my pacific heart,
Each moment it melts,
Each moment it dies,
When it sees two hearts happily in paradise,
You’re becoming an illusion now,
For I am like a fading star,
Shining from a sky-made just a little bit too far.