कौन कहता है ..... यादों के सहारे ज़िन्दगी बसर नहीं होती ?
होती है .... यक़ीनन होती है .....और इस तेवर से होती है !!
वो ख़ूबसूरत-सा एहसास, ज़िन्दगी करने को काफ़ी नहीं होता क्या ?

एक मुद्दत हुई डूबा था इन्हीं आँखों में 'मीत'
डूब कर फिर न वो उबरा, न उबरना चाहा
तेरी आँखों की कशिश, एक इशारा उन का
ज़िन्दगी भर के लिए अब है सहारा जिन का
तेरी आँखों में मुहब्बत का वो दरिया देखा
तेरी आँखों से सदाक़त का जो पैग़ाम मिला
थम गई उम्र-ए-रवां आ गया दिल को वो सुकूँ
गोया इस दिल को यही चाह थी हमेशा से
और मैं अपने ही तक़ाज़ों से बेगाना था
इस ज़माने से, ज़माने के तक़ाज़ों से जुदा
ज़िन्दगी चल रही थी, मुझ को ये गुमाँ भी न था
होगा ये हादिसा, इस का कोई इम्काँ भी न था
एक ख़ामोश चाँद-रात दबे पाँव कहीं
बेसदा और बेआवाज़ यूँ तेरा आना
और ख़ामोश मेरी ज़िन्दगी पे छा जाना
सानिहा ऐसा एक बार ही गुज़रता है दोस्त
एक ही बार कोई इस तरह किसी के लिए
हर नफ़स जीता है और हर नफ़स यूँ मरता है दोस्त
इक ज़रुरत, कि उसे जिस की ख़बर तक भी न हो
पूरी हो गर, तो बशर कुछ भी कर गुज़रता है दोस्त !
सदाक़त = सच्चाई
उम्र-ए-रवां = चलती हुई उम्र / ज़िन्दगी
तक़ाज़ा = ज़रूरत
इम्काँ = संभावना
सानिहा = हादिसा
नफ़स = साँस
बशर = इंसान