Monday, 25 April 2011

मन बहुत सोचता है


मन बहुत सोचता है कि उदास न हो
 पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय?

 शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले,
 पर यह अपने ही रचे एकान्त का दबाव सहा कैसे जाय!

 नील आकाश, तैरते-से-मेघ के टुकड़े,
 खुली घासों में दौड़ती मेघ-छायाएँ,
 पहाड़ी नदी : पारदर्शी पानी,
 धूप-धुले तल के रंगारंग पत्थर,
 सब देख बहुत गहरे कहीं जो उठे,
 वह कहूँ भी तो सुनने को कोई पास न हो—
 इसी पर जो जी में उठे वह कहा कैसे जाय!

 मन बहुत सोचता है कि उदास न हो, न हो,
 पर उदासी के बिना रहा कैसे जाय!