Saturday, 30 April 2011

राधा



वह, जो चला गया था
किसी गुरुतम उद्देश्य के लिए
मुझे छोड़,
उसके रंग-रस से
कितनी भरी-लसरी हूँ अबतक...
या रिक्त प्राण हूँ कितनी-
उसके बिना...
क्या ऐसा कुछ कह पाना संभव होगा
(क्या चुप रहना संभव होगा?)
आज अगर वह मिल जाये
तो क्या कहूँगी उस से...

वह ज्ञाता हैजानता तो होगा
कि वक़्त ने किये होंगे ही
मेरी काया पर भी
दस्तखत अपने
फिर भी डरती हूँ अपनी परछाई देख....
अस्थि-मज्जा-रक्त की देह यह
कितनी बड़ी अड़चन है....ओह!
राह में
आज अगर वह मिल जाये
तो क्या पहचान लेगा मुझे...


तुम चले गए कृष्ण !
लो मैं और लसर गयी तुममें...
अब इस यमुना की लहरों के बीच
खड़ी मैं...
भीतर श्याम छबि तुम्हारी
और बाहर श्यामल यमुना यह
(जैसे नदी में घट,
जल से भरा हुआ कोई)
मुझ सी बौरायी को
दूर कैसे करोगे खुदसे......
कैसे नकारोगे
मेरी जीवट तुच्छ व्यापकता?