Monday, 25 April 2011

तुम मेरी ही दीवानी हो


 संकोच-भार को सह न सका
 पुलकित प्राणों का कोमल स्वर
 कह गये मौन असफलताओं को
 प्रिय आज काँपते हुए अधर ।

 छिप सकी हृदय की आग कहीं ?
 छिप सका प्यार का पागलपन ?
 तुम व्यर्थ लाज की सीमा में
 हो बाँध रही प्यासा जीवन ।

 तुम करूणा की जयमाल बनो,
 मैं बनूँ विजय का आलिंगन
 हम मदमातों की दुनिया में,
 बस एक प्रेम का हो बन्धन ।

 आकुल नयनों में छलक पड़ा
 जिस उत्सुकता का चंचल जल
 कम्पन बन कर कह गई वही
 तन्मयता की बेसुध हलचल ।

 तुम नव-कलिका-सी-सिहर उठीं
 मधु की मादकता को छूकर
 वह देखो अरुण कपोलों पर
 अनुराग सिहरकर पड़ा बिखर ।

 तुम सुषमा की मुस्कान बनो
 अनुभूति बनूँ मैं अति उज्जवल
 तुम मुझ में अपनी छवि देखो,
 मैं तुममें निज साधना अचल ।

 पल-भर की इस मधु-बेला को
 युग में परिवर्तित तुम कर दो
 अपना अक्षय अनुराग सुमुखि,
 मेरे प्राणों में तुम भर दो ।

 तुम एक अमर सन्देश बनो,
 मैं मन्त्र-मुग्ध-सा मौन रहूँ
 तुम कौतूहल-सी मुसका दो,
 जब मैं सुख-दुख की बात कहूँ ।

 तुम कल्याणी हो, शक्ति बनो
 तोड़ो भव का भ्रम-जाल यहाँ
 बहना है, बस बह चलो, अरे
 है व्यर्थ पूछना किधर-कहाँ?

 थोड़ा साहस, इतना कह दो
 तुम प्रेम-लोक की रानी हो
 जीवन के मौन रहस्यों की
 तुम सुलझी हुई कहानी हो ।

 तुममें लय होने को उत्सुक
 अभिलाषा उर में ठहरी है
 बोलो ना, मेरे गायन की
 तुममें ही तो स्वर-लहरी है ।

 होंठों पर हो मुस्कान तनिक
 नयनों में कुछ-कुछ पानी हो
 फिर धीरे से इतना कह दो
 तुम मेरी ही दीवानी हो ।