चुभे है तीर सा,जब न मिले है जवाब उनसे
वो असल मैं है मशरूफ, या दर्द बेखबर उसे कोई?
मेरी बातो की तड़प का अंदाजा उसे नहीं शायद
मेरे लफ्जो को समझे भी, या इनकार उसे कोई ?
वो सोचे है के जिंदगी मैं गहरायी है बड़ी
मुझे न कल की खबर,जाने के ये खबर उसे कोई ?
बहुत हुई कोशिश उसके दो लफ्ज़ पाने की
अब तो शक !! के वो दिल है,या दिया पत्थर उसे कोई ?
वो असल मैं है मशरूफ, या दर्द बेखबर उसे कोई?
मेरी बातो की तड़प का अंदाजा उसे नहीं शायद
मेरे लफ्जो को समझे भी, या इनकार उसे कोई ?
वो सोचे है के जिंदगी मैं गहरायी है बड़ी
मुझे न कल की खबर,जाने के ये खबर उसे कोई ?
बहुत हुई कोशिश उसके दो लफ्ज़ पाने की
अब तो शक !! के वो दिल है,या दिया पत्थर उसे कोई ?